डॉ कमल किशोर डुकलान “सरल “
जनक्रांति ब्यूरो
भारतीय धर्म शास्त्रों में भगवान शिव और गन्धर्वों को सृष्टि में आदि संगीत का जनक माना गया है। उत्तराखंड के गढ़वाल अंचल में रहने वाले बादी अथवा बेडा समुदाय की पहचान मूलतः गायन व नृत्य होने वाली एक विशेष जाति के रुप में की जाती है। अपनी संगीत परम्परा को गन्धर्वों से जोड़ते हुए इन लोगों को भगवान शिव का वंशज माना गया है।
उत्तराखंड के हिमालय का इतिहास बहुत ही पुराना है, और हमारे पौराणों में भी उत्तरी हिमालय के अनेक जातियों के निवास के प्रमाण मिलते है,उत्तरी हिमालय में सिद्ध,गन्धर्व,यक्ष और किंनर जाति आदि। और इन जाति के राजा कुबेर को कहा जाता था। कहा जाता है कि वशिष्ठ मुनि अपनी पत्नी अरुंधति के साथ हिमदाव पर्वत पे चले गए थे। जंहा वो किरात लोगों के साथ बहुत लम्बे समय तक रहे। अतः इससे ये पता चलता है कि उत्तरी हिमालय में किरात लोग रहते थे। क्योंकि हिमदाव जिसे हिरदाव भी कहते है वह टिहरी गढ़वाल में एक पट्टी का नाम है, वहां विसों नाम का विशाल पर्वत है जंहा गुरू वशिष्ठ मुनि की गुफा और कुण्ड है।
चूंकि उत्तराखंड देवभमि है तथा माता पार्वती का मायका तथा भगवान शंकर का वास इसलिए यहां बादी अथवा बेडा समुदाय भगवान और गंधर्वों का वंशज होने के कारण ये बेड़ा समुदाय शिव की तरह जटा-जूट भी रखते हैं। इस समुदाय के लोगों की मान्यता है,कि भगवान शिव ने उन्हें खेती-बाड़ी के बदले लोक हित में गाने-बजाने और बेड़ावर्त तथा लांग जैसे कृषि अनुष्ठानों को करने की आज्ञा दी थी। हिमालय के ये गन्धर्व आदिकाल से उत्तराखंड की लोक संस्कृति के संवाहक रहे हैं। गाने-बजाने व नृत्य की कला में निपुण होने के साथ ही बेड़ा समुदाय के लोग गीत रचने में भी सिद्धहस्त रहे हैं। किसानों की ऋतु फसल पर बेड़ा समुदाय के गीत रचनाओं में देवी-देवताओं से जुड़े कथानकों से लेकर स्थानीय समाज की विविध घटनाओं का उनके गीतों में मिलता है।
बेड़ा समुदाय की गीत गायन में शिव-पार्वती नृत्य व नट-नटी नृत्य अद्भुत है। ढोलक की थाप और इनके मिठास भरे गीत मन को छू लेते हैं। इनके नृत्य में मन्थर गति,हाथों की विशेष मुद्रा के साथ ही लास्य और उत्कृष्ट भावाभिनय की उपस्थिति इनके गीत गायन और नृत्य में रहती है। ‘राधाखण्डी’ इनके गायन की एक विशेष शैली है जो लांग के अवसर पर गायी जाती है. स्वर्ग डालि बिजुली पयाल डालि फूल, नाचे गौरा कमल जसो फूल शिव ज्यू लै डमरु बजाया गौरजा नाचै, यो मेरो वरदाना मी थैं नी जयां भूल. आज से साठ-सत्तर साल पहिले बादी/बेड़ा समुदाय के कुछ कौशल सम्पन्न लोग बेड़ावर्त और लांग जैसे लोक अनुष्ठानों में मुख्य भूमिका निभाते थे।
ऋतु फसल पर खेती-बाड़ी व गांव की समृद्धि के लिये आयोजित होने वाले इस सामूहिक अनुष्ठान के दौरान बेड़ा को तकरीबन 400 गज लम्बी मजबूत रस्सी में लकड़ी की काठी में बैठकर फिसलना होता था। जब बेड़ा सकुशल इस अनुष्ठान को पूरा कर लेता था तो उपस्थित समाज वस्त्र-आभूषण,धन और अनाज देकर उसका सम्मान करता था। उन्नीसवीं सदी के अंग्रेज घुमक्कड़ विलियम मूरक्राफ्ट ने अपने संस्मरण में उस समय टिहरी के नामी बेड़ावर्त विशेषज्ञ ’बंचु’ का उल्लेख किया है। बंचु’ के बाद ‘सेवाधारी’ नामक एक और विशेषज्ञ भी इस कला में प्रसिद्ध हुआ।
बेड़ा कभी गायन-वादन और नृत्य से अपनी आजिविका चलाने वाले ये लोग आज अपने को गांव समाज में उपेक्षित सा महसूस कर रहे हैं। पहाड़ से लोगों के पलायन करने और खेती-बाड़ी से विमुख होने से इनकी रोजी-रोटी पर संकट छाने लगा है. पुराने समय में गांव इलाके के आधार पर इनकी ‘बिर्ति’ (जीविका क्षेत्र) बंटी हुई थी जिनमें घूम-घूम कर ये लोग अपनी कला का प्रदर्शन कर अपना जीवनयापन करते थे।
आज से 25-30 वर्ष पहले जब गांव साधन-संपन्न तथा लोग खेती-किसानी करते थे तब हिमालय की इस गन्धर्व परम्परा को उत्तराखंड में ऋतु फसल पर इस बेड़ा समुदाय को उनकी कला की कद्र करते हुए उन्हें धन और अनाज आदि देते थे। पलायन के दौर में सूने पहाड़,खाली होते गांव उत्तराखंड की नयी पीढ़ी ऐसा कुछ नहीं कर रही है। समय के साथ,आधुनिकता और ग्रामीण क्षेत्रों से पलायन के कारण इस अनूठी परंपरा पर संकट आ गया है। इस कला को प्रदर्शित करने वाले समुदाय के लोग अब गाँव के समाज में उपेक्षित महसूस करते हैं, और खेती-बाड़ी से लोगों के विमुख होने से उनकी रोजी-रोटी पर भी असर पड़ा है। संक्षेप में कहा जाए तो बेड़ा, बद्दी नृत्य का इतिहास एक समृद्ध सांस्कृतिक अनुष्ठान से जुड़ा है, जो सामुदायिक जीवन और कृषि की खुशहाली का प्रतीक था, लेकिन अब यह परंपरा धीरे-धीरे कम हो रही है।
