
जनक्रांति ब्यूरो (भैया दूज स्पेशल)
पंच दिवसीय दीपोत्सव की कड़ी में दीपा वली के बाद मनाया जाने वाला पांचवां उत्सव भैयादूज का पर्व एक विशेष पर्व है,जो भाई बहन के अटूट रिश्तों को मजबूत करता है। यह पर्व प्रतिवर्ष कार्तिक मास में शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को मनाया जाता है। कार्तिक माह में शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को मृत्यु के देवता भगवान यमराज का अपनी बहन यमुना से मिलने के कारण भैयादूज को यम द्वितीया के नाम से भी जाना जाता है।

लोक मान्यताओं के अनुसार कहा जाता है,कि कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को मृत्यु के देवता भगवान यमराज अपनी बहन यमुना के घर कार्तिक शुक्ल द्वितीया को भोजन करने गए थे। बहन यमुना ने अपने भाई का तिलक कर उनका स्नेह पूर्वक स्वागत किया और भोजन कराया। यमुना के इस आतिथ्य सत्कार से प्रसन्न होकर मृत्यु के देवता यमराज ने बहन यमुना को अकाल मृत्यु के भय से मुक्त किया और आजीवन अमरता का वरदान दिया था।
भैयादूज का पावन पर्व भाई -बहन के बीच के अटूट प्यार, सम्मान और कर्तव्य बोध को दर्शाता है। इस दिन बहनें अपने भाई के लिए लंबी उम्र, सुख और समृद्धि के लिए प्रार्थना करती हैं। भाई भी अपनी ओर से बहन को उपहार और उनको उनकी रक्षा का आशीर्वाद देते हैं, जिससे भाई -बहिनों के बीच प्यार और भरोसा और अधिक मजबूत होता है। यह पर्व केवल उपहार और तिलक का अवसर नहीं है, बल्कि भाई-बहन के पारंपरिक संबंध में सुरक्षा, सम्मान और जिम्मेदारी की भावना को भी उजागर करता है।

भैया दूज और स्व-बोध सीधे तौर पर परस्पर संबंधित नहीं हैं, क्योंकि यह एक त्योहार है और दूसरा एक दार्शनिक अवधारणा। हालांकि, दोनों ही जीवन में गहरे संबंधों और आत्म-समझ पर ज़ोर देते हैं। आजकल जिस तरह से समाज में एक दूसरे की नकल का प्रचलन बढ़ रहा है, उसमें स्व के बोध का जागरण होना आवश्यक है। ‘स्व-बोध’ का अर्थ है खुद को,अपनी ज़रूरतों, इच्छाओं,अनुभव, वास्तविक ज्ञान और क्षमताओं को गहराई से समझना। यह एक आंतरिक यात्रा है जो जीवन के हर पहलू को प्रभावित करती है। स्व-बोध जीवन में निर्णय लेने के लिए एक दिशासूचक का काम करता है। जब आप खुद को अच्छी तरह समझते हैं, तो आप सही और गलत के बीच का अंतर पाते हैं और अपने लक्ष्यों को बेहतर ढंग से निर्धारित कर सकते हैं।
पंच दिवसीय दीपोत्सव को भाई-बहन के प्रेम के इस पारंपरिक त्योहार भैयादूज को ‘स्व के बोध’ से जोड़ने का तात्पर्य प्राचीनकाल से ही भारत की पारिवारिक संबंधों को जोड़ने की एक सांस्कृतिक पहचान रही है। भैयादूज पर्व पारिवारिक संबंधों को मजबूत करने का एक अवसर है।
भैया दूज याने भाई बहन के मिलने का अवसर भारतीय सांस्कृतिक पहचान और अपनत्व का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। भैयादूज के माध्यम से हम अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ने और ‘स्व’ यानी अपनी भारतीय पहचान को समझने के लिए प्रेरित करता है। वर्तमान भौतिकवाद में आज जिस तरह से पारिवारिक मूल्यों में गिरावट देखने में आ रही है,इस संदर्भ में भैयादूज पर्व भाई-बहन के रिश्ते की अन्तर्मन से गहराई को दर्शाता है।
सनातन संस्कृति में मजबूत पारिवारिक संबंध ही एक मजबूत राष्ट्र का आधार होते हैं। भैया दूज इन पारिवारिक मूल्यों को बढ़ावा देता है। भैया दूज जैसे त्योहारों से भाई-बहन के अटूट रिश्ते मजबूत तो होते ही हैं,साथ ही इन रिश्तों से एकजुटता से आदर्श समाज का निर्माण भी होता है। अटूट रिश्ते और पारिवारिक एकजुटता ही सम्भल समाज व सशक्त राष्ट्र निर्माण’ के लक्ष्य का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।
