
जनक्रांति ब्यूरो ( त्यौहार स्पेशल)
दीपावली का प्रकाश पर्व सुख-समृद्धि, उत्सवधर्मिता की ओर गतिशील होने के साथ-साथ शिक्षा-जागरूकता के दीये,परिश्रम के ईंधन,कुशलता की बाती और राष्ट्रप्रेम की अग्नि से हमें रोशनी का अनुपम साम्राज्य प्रकाशित होता रहें।…..
बचपन की दीपावली का स्मरण ध्यान में आ रहा है,कि जब हम दीपावली के दीये सजाते थे तो हम घर के हर अंधेरे छोर को ढूंढते थे और हर अंधेरे छोर को उजाला करने की हममें अधिक से अधिक हर्षपूर्ण होड़ लग जाती थी। सभी बच्चों में दीपावली के दिन एक ऐसी प्रतिस्पर्धा रहती थी कि कौन सबसे ज्यादा अंधेरे भगाएगा,कौन ज्यादा दीये रोशन करेगा? हमारा संविधान भी हम सभी नागरिकों से यही आशा करता है कि हम अपने आसपास के हर अंधेरे पक्ष का अंत करें। विकसित भारत के संकल्प के साथ हर अंधेरे पक्ष को दूर करने और करवाने की जिम्मेदारी देश के प्रत्येक नागरिकों पर है। दीपावली का प्रकाश पर्व हमें वास्तव में गरीबी,अभाव,गंदगी,रोग,समता-समानता, सद्भावना आदि की ओर सजगता के लिए हमें प्रेरित भी करता है। समाज का हर अंधेरा पक्ष कुछ लोगों के भगाए नहीं भागेगा,यह व्यक्ति, समाज और सरकार की सामूहिक जिम्मेदारी है।
इसमें कोई संदेह नहीं कि आजादी के बाद समाज के हर अंधेरा पक्ष को दूर करने के लिए ही पांच वर्षों में लोकतंत्र के हर स्तर पर हम हर अपने जनप्रतिनिधियों का चुनाव करते हैं। चुने हुए प्रतिनिधियों की समाज के हर अंधेरे पक्ष को दूर करने की जिम्मेदारी इसमें सर्वाधिक रहती है,क्योंकि वे हर अंधेरे पक्ष को दूर करने के वादे के साथ ही कुर्सी पर बैठते हैं या सत्ता में आते हैं। अगर निर्वाचित जन-प्रतिनिधियों की निगाह हर अंधेरे पक्ष पर नहीं पड़ती है,तो अगली बार चुनाव में उनके यहां से सत्ता का उजाला स्वत: ही ओझल हो जाता है। अगली बार लोकतंत्र में ऐसे लोग चुनकर आते हैं,जिन पर जनता को विश्वास होता है कि वे अंधेरे पक्ष को भगाएंगे। सोचकर देखिए,फूटे दीये कौन खरीदता है? ऐसा मिलावटी तेल दीयों में कौन भरना चाहता है,जो जलने में आना-कानी करें? एक-एक दीया,एक-एक बाती चुन-चुनकर ली और सजाई जाती है,तभी हमारी दीपावली साकार होती है। ठीक उसी तरह,लोकतंत्र में भी जन-प्रतिनिधि जब योग्यता के आधार पर चुने जाते हैं,तो वे अंधेरों पर टूट पड़ते हैं और खुशहाली के कर्णधार बन जाते हैं। आजादी के बाद देश में जो भी हमें तरक्की नजर आती है,उसमें अनेक अच्छे चुने गए नेताओं का ही हाथ है। 15 अगस्त ,1947 को जब हम स्वतंत्र हुए थे,तब हम भारतीयों का औसत जीवन 60 साल भी नहीं था,आज हम बहुत आसानी से 90-100 साल जीने लगे हैं। मतलब,आजादी मिलने के बाद विकास की जो रोशनी फैली है,उसे कोई नकार नहीं सकता। कभी अन्न का भी अभाव था,तो भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री स्व.लाल बहादुर शास्त्री जी ने हफ्ते में एक समय का उपवास रखने की बात की थी। आजादी के शुरुआती दो दशकों में ही हमारी मेहनत रंग लाई और हम अन्न के अभाव से बाहर आने लगे। अभाव के ज्यादातर अंधेरों से हम बहुत दूर आ गए हैं और यही वजह है कि देश का आम नागरिक भी लोकतंत्र पर गाढ़ा विश्वास करता है।
आजादी के 79 वर्षों बाद दीपावली की सुखद समीक्षा का भी समय है। समाज में रोशनी फैलाने के लिए सदा तैयार रहिए कि कोई अंधेरा बचने न पाए। भारत में यदि तमाम तरह की सांस्कृतिक,सामाजिक, भाषायी विविधताओं को कायम रखना है, तो लोकतंत्र से कोई बेहतर व्यवस्था हो ही नहीं सकती। हमें देखना होगा कि हमारे हिस्से का लोकतंत्र कितना रोशन है? यहां हमारी या जरूरतमंदों की आवाज कितनी सुनी जा रही है? पिछले वर्षों में हम कोरोना जैसी महामारी के बहुत दौर से गुजरे हैं,जब कोरोना महामारी का भयानक अंधेरा हम पर मंडरा रहा था,तब हम मन मसोसकर दीपावली मना पाए थे। वर्तमान समय में उत्तराखंड भयानक प्राकृतिक आपदा से ग्रसित है। कोरोना जैसी महामारी तथा प्राकृतिक आपदाओं का यह दौर फिर न आए,यह हमें सुनिश्चित करना होगा। ठान लीजिए,शिक्षा-जागरूकता के दीये, परिश्रम के ईंधन,कुशलता की बाती और राष्ट्रप्रेम की अग्नि से हमें रोशनी का अनुपम साम्राज्य लाना है।
नरक चतुर्दशी,रुप चौदश, छोटी दीपावली की आपको हार्दिक बधाई एवं मंगलमयी अनन्त शुभकामनाएं।
ग्रीन वैली गली नं 5 सलेमपुर, सुमन नगर, बहादराबाद (हरिद्वार)
