
राज्य स्थापना दिवस पर विशेष
जनक्रांति ब्यूरो
उत्तराखंड का विकास एवं राजनीति के पैमाने पर अगर इन 25 वर्षों में मूल्यांकन किया जाए तो अन्य राज्यों की तुलना में विकास की गति बेहतर है। राज्य की जनता विकासमान जनतंत्र चाहती है। वह अपनी आलोचनात्मक चेतना से हर पांच वर्षों में सत्ता हस्तांतरण कर यहां की राजनीति को नियंत्रित करती रहती है। इसी पर प्रख्यात शिक्षाविद् , साहित्यकार डॉ कमल किशोर डुकलान सरल के उत्तराखंड स्थापना की रजत जयंती अवसर पर अपने विचार व्यक्त किए।
अविभाजित उत्तर प्रदेश से पर्वतीय क्षेत्रों की उपेक्षा का दंश ही पृथक पर्वतीय राज्य के आंदोलन के मूल में रहा। राज्य आंदोलनकारियों पर हुए तमाम तरह के दमन और संघर्षों के बाद 9 नवंबर सन् 2000 को देश के 27वें राज्य का उत्तरांचल रुप में का गठन हुआ। राज्य की भावनाओं के अनुरूप उस समय की तत्कालीन केन्द्र सरकार ने सन् 2007 में राज्य का नाम बदलकर उत्तराखंड किया। राज्य गठन के 25 वर्ष पूर्ण होने जा रहे हैं,और राज्य के 25 वर्ष पूर्ण होने पर राज्य गठन की रजत जयंती मना रहा है।
राज्य स्थापना दिवस राज्य के लिए सिर्फ एक तारीख नहीं,बल्कि उन लाखों लोगों के संघर्ष,राज्य के लिए अपने प्राण न्यौछावर करने वाले असंख्य शहीदों और राज्य आन्दोलन कारियों के सपनों का प्रतीक है, जिन्होंने एक अलग पृथक पर्वतीय राज्य का सपना देखा था। राज्य गठन के इन पच्चीस वर्षों में,उत्तराखंड ने विकास की राह पर अनेकों मील के पत्थर स्थापित किए,लेकिन राज्य की बिषम भौगोलिक परिस्थितियों के अनुसार अनेकों चुनौतियाँ भी आज पर्वतीय राज्य में पहाड़ की तरह खड़ी हैं।
राज्य गठन के समय उत्तर प्रदेश से अलग हुए पर्वतीय अंचल जिसका कि 93 प्रतिशत पर्वत एवं 64 प्रतिशत वन अच्छादित क्षेत्र को 9 नवम्बर सन् 2000 में एक नए राज्य के रूप में संयोजित किया गया था। उत्तराखंड को अलग राज्य बनाने के पीछे का एक हेतु यह भी था कि यहां का त्वरित विकास एवं सक्षम प्रशासन हो यहां की ऐसा विकास की गति द्रुतगति से आगे बढ़े। रजत जयंती वर्ष में विधानसभा के विशेष सत्र में महामहिम राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पर अनेकों विधायकों के वक्तव्य राज्य विधानसभा में सुनाई दिए।
उत्तर प्रदेश से अलग हुए उत्तराखंड के साथ मध्यप्रदेश से अलग छत्तीसगढ़ और बिहार से अलग कर झारखंड सहित दो अन्य राज्य एक साथ 9 नवम्बर ,सन् 2000 को अस्तित्व में आये थे। इन राज्यों के बनने से यह माना जा रहा था कि छोटे राज्य बनने से इन पिछड़े क्षेत्रों में विकास को गति मिल सके।
विकास के साथ-साथ इन नए राज्यों की जनता को एक ऐसे नेतृत्व पाने की आकांक्षा थी,जो उनका हो,उनको जान-समझ सकें एवं उनके प्रति संवेदनशील हो। इन राज्यों को बने 25 वर्ष का एक लंबा कालखंड पूरा हो होने जा रहा है। इन पच्चीस वर्षों में विकास एवं राजनीति के संदर्भ में इन छोटे राज्यों के प्रदर्शन का एक मूल्यांकन करें तो इन राज्यों का अन्य राज्यों की तुलना में गहराई से मूल्यांकन किया जाए,तो उत्तराखंड की विकास गति अन्य छोटे राज्यों की तुलना में बेहतर मानी जाएगी। उत्तराखंड की आर्थिक विकास दर राष्ट्रीय आर्थिक विकास दर से भी बेहतर मानी गई है। उत्तराखंड ने इन पच्चीस वर्षों में आय का औसतन 26 प्रतिशत की आर्थिक विकास दर का लक्ष्य प्राप्त किया है,जो छह-सात प्रतिशत की राष्ट्रीय विकास दर की तुलना में अधिक है। शिक्षा,स्वास्थ्य,सड़क,पर्यटन,परिवहन जन्म एवं मृत्यु दर जैसे अनेक सामाजिक मानकों के दृष्टिकोण से उत्तराखंड का प्रदर्शन अन्य दो राज्यों की अपेक्षा बेहतर माना गया है।
9 नवम्बर सन् 2000 को बने ये तीनों छोटे राज्य जन एवं सामाजिक आकांक्षाओं की मूल राजनीतिक अभिव्यक्ति थी। इन राज्यों को बनाने वाले जनांदोलनों में यह कल्पना साफ देखी जा सकती थी कि इन राज्यों का नेतृत्व जड़ों से जुड़े एवं यहां के समाज के प्रति संवेदना से ओत-प्रोत हो। ऐसा इन पच्चीस वर्षों में हो भी रहा है उत्तराखंड विधानसभा की बात करें तो यहां की जनता अब तक सात चुनाव देख चुकी है। इस राज्य के ग्यारह मुख्यमंत्री अब तक बन चुके हैं। जो प्रायः सभी यहां की जमीन से जुड़े रहे हैं। विकास पुरुष श्री नारायण दत्त तिवारी हालांकि उत्तराखंड बनने के पूर्व से ही राष्ट्रीय नेता के रूप में प्रतिष्ठित रहे हैं। उत्तराखंड बनने के बाद इसके विकास की आधारशिला इन्होंने ही रखी। विजय बहुगुणा जो हेमवतीनंदन बहुगुणा के सुपुत्र हैं, इलाहाबाद में पले-बढ़े हैं। इलाहाबाद में अपने लंबे प्रवास के बाद जब वह उत्तराखंड की राजनीति में आए,तो उन्होंने साबित किया कि वह यहां के सामाजिक अन्तर्विरोधों को गहराई से समझते हैं। उत्तराखंड के अन्य मुख्यमंत्रियों में भगत सिंह कोश्यारी,भुवनचंद्र खंडुरी, रमेश पोखरियाल निशंक, हरीश रावत,त्रिवेंद्र सिंह रावत,तीरथ सिंह रावत,पुष्कर सिंह धामी भी इस क्षेत्र की जनआकांक्षाओं से गहराई से जुड़े रहे हैं। हरीश रावत की शिक्षा-दीक्षा हालांकि लखनऊ में हुई,परंतु उत्तराखंड की जमीन से हरीश रावत का गहरा रिश्ता बना रहा है। जन सम्पर्क और मिलन सार व्यवहार में जमीनी नेता हरीश रावत और भगत सिंह कोश्यारी का कोई जबाब नहीं है।
राजनीति की बैटिंग में अगर डाक्टर रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ की बात करें तो डॉक्टर रमेश पोखरियाल निशंक उत्तराखंड के ऐसे लोकप्रिय जननेता हैं। जिन्होंने सरस्वती शिशु मंदिर योजना से अपनी राजनीतिक पारी की शुरुआत की। डाक्टर रमेश पोखरियाल निशंक ने
1990 में उत्तर प्रदेश की राजनीति में उस समय कांग्रेस के अत्यंत लोकप्रिय, कद्दावर नेता डाक्टर शिवानन्द नौटियाल जो कि पांच बार से लगातार उस समय कर्ण प्रयाग विधानसभा क्षेत्र से लगातार जीत दर्ज कर रहे थे, डाक्टर रमेश पोखरियाल निशंक ने डाक्टर शिवानन्द नौटियाल को हराकर 1991 में उत्तर प्रदेश विधानसभा में पहुंचे। 2009 से 2011 के बीच जब वह उत्तराखंड के मुख्यमंत्री बने तो उन्होंने हरिद्वार एवं उधमसिंह नगर का सफल विलय उत्तराखंड में करने का जटिल काम संपन्न किया। आज ये हरिद्वार और ऊधम सिंह नगर उत्तराखंड के विकास के लिए खाद्य उत्पाद करने वाला महत्वपूर्ण क्षेत्र के रूप में मौजूद है। हरीश रावत भी अपने सघन जनसंपर्क और मिलन सार प्रवृत्ति के कारण एक सफल जननेता के रूप में उत्तराखंड में लोकप्रिय हुए,फिर वह राज्य के मुख्यमंत्री बने। त्रिवेंद्र सिंह रावत राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की पृष्ठभूमि के कारण उत्तराखंड की जमीनी संघर्ष में राजनीति के पायदान में पहुंचे और राज्य के मुख्यमंत्री बनें। अपनी सरल व मिलन सार प्रवृत्ति के कारण तीरथ सिंह रावत भी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की विद्यार्थी शाखा अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के लम्बे समय तक राष्ट्रीय स्तर के सांगठनिक दायित्वों के निर्वहन के बाद राजनीति की मुख्यधारा से जुड़े और सांसद व राज्य के मुख्यमंत्री तक का सफर तय किया। अब अगर वर्तमान मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की बात की जाए तो पुष्कर सिंह धामी भी लखनऊ विश्वविद्यालय से अपनी छात्र राजनीति से शुरुआत कर भाजपा के युवा मोर्चा में प्रदेश अध्यक्ष जैसे दायित्वों से निर्वहन करने के पश्चात राज्य की वर्तमान सरकार में नेतृत्व कर रहे हैं।
उत्तराखंड की राजनीति में दो दल कांग्रेस एवं भारतीय जनता पार्टी मुख्य रूप से प्रभावी हैं। हर पांच साल में राज्य सत्ता पर इन दो दलों की ही अदला-बदली चलती रहती है। मोदी जी के विकास पर और भाजपा का पृथक पर्वतीय राज्य में सांगठनिक ढांचा मजबूत होने के कारण भाजपा प्रदेश के मुख्यमंत्री के नेतृत्व में हर पांच साल में एक बार भाजपा एक बार कांग्रेस का सत्ता पर काबिज होने का मिथक तोड़ते हुए 2022 में जनता ने मोदी के विकास और मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के लोककांक्षी योजनाओं पर मुहर लगाते हुए पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में भाजपा को ही मौका दिया।
उत्तराखंड क्रांति दल जैसे संगठन जो उत्तराखंड के निर्माण के समय काफी सक्रिय था,राज्य की राजनीति कभी कांग्रेस तो कभी भाजपा की सरकारों में उत्तराखंड क्रांति दल की भागीदारी के कारण आज यह दल हाशिये पर हैं। अगर उत्तराखंड क्रांति दल के राज्य से हासिये पर जाने के अन्य कारणों का विश्लेषण किया जाए तो इसका एक कारण यह भी है कि उत्तराखंड की जनता राज्य निर्माण के लिए जनसंघर्ष इसलिए कर रही थी,कि उसको अपना दीर्घकालिक विकास चाहिए था। जिन दलों के पास उत्तराखंड के निर्माण के साथ उसके भविष्य के जनतंत्र एवं विकास की टिकाऊ राजनीति की संभावना जनता ने देखी राज्य बनने के बाद उत्तराखंड की जनता उन्हीं दलों से जुड़ती चली गई। आज अगर इन पच्चीस वर्षों में देखा जाए तो जनतंत्र की राजनीति मूलतः विकास की राजनीति में परिवर्तित होती दिख रही है। जनता ने यह साबित किया कि जो उसे जितनी प्रतिबद्धता एवं ईमानदारी से करेगा जनता उन दलों से जनता उतनी ही जुड़ती चली जाएगी और जनता ने यह साबित भी किया। उत्तराखंड की जनता ने भी पच्चीस वर्षों में दिखाया है कि राज्य की जनता एक विकासमान जनतंत्र चाहती है।
