डॉ.कमल किशोर डुकलान ‘सरल’)

जनक्रांति ब्यूरो
नेता जी सुभाषचन्द्र बोस भारत के उन तमाम नवयुवकों के ऐसे प्रेरणास्रोत हैं। जो जीवन की चुनौतियों को स्वीकारना जानते हैं। सदियों से कहावत रही है कि ’पूत के पांव पालने में दिख जाते हैं’ जिसका बेहतरीन उदाहरण सुभाषचन्द्र बोस में देखा जा सकता है।…..
भारतवर्ष अनादिकाल से प्रेरणाओं वाला देश रहा है। भारत की माटी में जन्में महापुरूषों ने न केवल भारत के नौजवानों के लिए उत्साहवर्धन का काम ही नहीं किया अपितु दुनिया भर में साहस और शौर्य का प्रतीक बने हैं। भारत विविधताओं से भरी क्षमताओं वाला देश है। नेता जी सुभाष चन्द्र बोस एक ऐसा नाम है जिन्होंने विपरीत परिस्थितियों से लडकर जीत हासिल करने में पारंगत लोगों की सूची में अग्रिणी नाम है। प्रतिवर्ष 23 जनवरी को नेता सुभाष चन्द्र बोस की जयंती भारतवर्ष ’’पराक्रम दिवस’’ के रूप में मनाता है। उनकी सूझबूझ और रणनीति से प्रेरित होकर जर्मनी के तानाशाह हिटलर ने उन्हें नेताजी कहकर संबोधित किया।
नेता जी सुभाष चन्द्र बोस भारत के तमाम नवयुवकों के प्रेरणास्रोत हैं। जो जीवन की चुनौतियों को स्वीकारना जानते हैं। सदियों से कहावत रही है कि ’पूत के पांव पालने में दिख जाते हैं’ जिसका बेहतरीन उदाहरण सुभाषचन्द्र बोस हैं। साहस के साथ समाज सेवा,देश प्रेम के साथ राष्ट्र भक्ति की मिशाल हैं सुभाषचन्द्र बोस।
जीवन की जटिलताओं को सरल बनाने का साहस नेताजी सुभाष चन्द्र बोस में दिखाई देता है ऐसा कम ही देखने को मिलता है। आज भी भारतीय युवाओं में सिविल सेवा की परीक्षा को पास करने के जज्बे पर नेताजी को देखा जा सकता है। आप ने वर्ष 1919 में भारतीय सिविल सेवा ’’आई.सी.एस.’’ की परीक्षा उत्तीर्ण की और बाद में इस्तीफा देकर देश की आजादी के सपने को सच करने के मिशन में लग गए। सुभाषचन्द्र बोस अपने आध्यात्मिक गुरू विवेकानन्द जी को एवं राजनीतिक गुरू चितरंजन दास को मानते थे। सन् 1921 में नेताजी सुभाषचन्द्र बोस ने चितरंजन दास की स्वराज पार्टी द्वारा प्रकाशित समाचार पत्र ’फारवर्ड’ के सम्पादन का कार्यभार संभाला।
भारत पूर्ण स्वराज के साथ दुनिया के केन्द्र में बना रहे यह सपना नेताजी सुभाषचन्द्र बोस ने देखा था। ऐसे कई मौके आए जब नेताजी ने भारत की गुलामी की जंजीरों को पिघलाने की कोशिश की। कभी जेल गए तो कभी ब्रिटिश हुकूमत को आसानी से चकमा देकर अपने सीक्रेट मिशन को पूरा करने में सफल रहे। वो जब तक रहे अंग्रेजी हुकूमत को चैन से सोने न दिया। आजादी मिलने से चार साल पहले ही नेताजी सुभाषचन्द्र बोस ने हिन्दुस्तान की पहली सरकार का गठन कर दिया था।
21 अक्टूबर सन 1943 का दिन इतिहास कभी न भुला पाएगा, जब भारत पर अंग्रेजी हुकूमत थी और नेताजी ने सिंगापुर में आजाद हिंद सरकार की स्थापना कर डाली। नेताजी का यह कदम अंग्रेजी सरकार को यह बतलाने के लिए पर्याप्त था कि भारत में उनकी सरकार का कोई अस्तित्व नहीं रह गया है भारतीय अपनी सरकार चलाने में सक्षम है। आजाद हिंद फौज के सर्वोच्च सेनापति के तौर पर सुभाष चन्द्र बोस ने स्वतंत्र भारत की अस्थायी सरकार बनायी। जिसे 9 देशों ने मान्यता दी जिसमें जर्मनी, फिलीपींस, जापान जैसे देश शामिल थे। जापान के द्वारा अंडमान और निकोबार द्वीप आजाद हिंद सरकार को दे दिए गए जिनका सुभाषचन्द्र बोस ने नामकरण किया। अंग्रेजों द्वारा सत्ता हस्तांतरण के चार वर्ष पहले 30 दिसम्बर 1943 को अंडमान निकोबार में सुभाषचन्द्र बोस ने आजाद हिन्द सरकार का पहला तिरंगा 30 सितम्बर 1943 अंडमान निकोबार में फहराया।
सुभाषचन्द्र बोस ने आजाद हिन्द सरकार के द्वारा राष्ट्रीय ध्वज के रूप में तिरंगे को और राष्ट्रगान के रूप में जन-गण-मन को चुना और अभिवादन के लिए ’जय हिंद’ का प्रयोग करने की परम्परा का आगाज किया। उनके द्वारा दिए गए उद्बोधन में ’दिल्ली चलो’ के नारे ने आज भी लोगों में जोश भरने का काम जीवित रखा है। ’तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आजादी दूंगा’ के नारे को बुलन्द करने वाले भारत के महान क्रान्तिकारी योद्वा नेताजी सुभाषचन्द्र बोस के जीवन से जुडे कई प्रेरणादायक किस्से हैं जिन्हें देख उनकी क्रान्ति मय जीवन का अनुमान लगाया जा सकता है।
कहते हैं एक बार बचपन में सुभाष चन्द्र बोस अपनी माता प्रभावती के साथ मां काली के मन्दिर गए थे उनकी मां पूजा के लिए घर से सिंदूर लाना भूल गयी तभी उनकी मां को ध्यान आया और उन्होने सुभाष से घर जाकर सिंदूर लाने के लिए कहा लेकिन घर दूर था तभी सुभाष ने सोचा घर से सिंदूर लाने में काफी वक्त लगेगा और तभी पास पडे एक चाकू से अपने अंगूठे पर चीरा लगा कर अपनी मां से कहा कि वह उनके रक्त को सिंदूर मानकर मां काली के चरणों में अर्पित कर दें। उनके साहस का बाल्यकाल में ऐसा उदाहरण उनके साहस एवं पराक्रमी जीवन को दर्शाता है।
भारत नेताजी सुभाषचन्द्र बोस जी के जन्मदिन को पराक्रम दिवस के रूप में मनाता है। निसंदेह सुभाषचन्द्र बोस भारत के नव युवकों के रियल हीरों हैं। उनका जीवन साहस, शक्ति और पराक्रम की ऐसी प्रेरणादायक गाथा है जिसने भारत ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण विश्व को अपने अधिकारों के लिए संगठित होकर लड़ने के लिए प्रेरित करने का काम किया है। नेताजी सुभाषचन्द्र बोस का जीवन स्वतंत्रता,समानता,साहस से भरपूर आपसी सौहार्द्र को बनाये रखने में एक मिशाल है। ऐसे प्रेरणास्रोत सदैव जीवित रहकर अपने राष्ट्र के युवाओं को राष्ट्रसेवा के लिए सदैव प्रेरित करते रहते हैं जैसे नेताजी सुभाषचन्द्र बोस करते हैं।
