
जनक्रांति ब्यूरो
हरिद्वार ।सूर्य देव के प्रति अगर आभार प्रकट करते का कोई दिन है,तो वह है,कार्तिक शुक्ल षष्ठी को पढ़ने वाला छट महापर्व। आधुनिक जीवन की मजबूरी में जब अक्षय ऊर्जा की जब बात आती है, तब हमारी सम्पूर्ण दृष्टि की भगवान सूर्य नारायण की ओर जाती है। भगवान सूर्य नारायण हमारे अतीत ही नहीं, बल्कि भविष्य भी हैं।
छट महपर्व सृष्टि का अकेला एक ऐसा लोकपर्व है,जो अपनी व्यंजकता में बहुआयामी है। छट पर्व में धार्मिक, सांस्कृतिक,प्राकृतिक,आर्थिक,सामाजिक,वैज्ञानिक और आध्यात्मिक आयाम की सबसे अधिक प्रबलता है। छट महपर्व के भगवान सूर्य नारायण केन्द्र हैं।

ऐसा माना जाता है कि छठ पूजा भगवान राम से जुड़ी घटना है। कहते हैं,कि जब भगवान श्री राम चौदह वर्ष के वनवास के बाद अयोध्या लौटे तो उन्होंने और माता सीता ने सूर्य देव के सम्मान में कार्तिक शुक्ल षष्ठी को उपवास रखा और प्रातः उगते सूर्य की आराधना के साथ ही अपना उपवास तोड़ा था। पौराणिक दंत कथाओं की मानें तो माता सीता ने पहली बार मुंगेर (बिहार) में छठ पर्व प्रारम्भ किया था। इसी कारण छट पर्व का महत्व भारत के पूर्वांचल क्षेत्र में अधिक प्रचलन है। बिहार के मुंगेर में माता सीता को समर्पित सीता चरण (सीता चरण मंदिर) आज भी है। महाभारत काल में सूर्य देव और कुंती से संतान रूप में कर्ण के होने का उल्लेख मिलता है। कहा जाता है कि कर्ण आमतौर पर पानी में खड़े होकर सूर्यदेव की आराधना करते थे। वहीं द्रौपदी और पांडवों के द्वारा भी अपना राज्य वापस पाने के लिए सूर्य उपासना का उल्लेख मिलता है। इसके अलावा छट पूजा का संदर्भ राजा प्रियंवद की कहानी से भी जुड़ा है, जिसमें उन्होंने सबसे पहले छठ पूजा की शुरुआत की थी।

छठ पूजन महज एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि इसमें वैज्ञानिक तथ्य भी छुपा है। उपवास रखने वाले शारीरिक और मानसिक रूप से इसके लिए तैयार होते हैं। छठ पर्व महज एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं,बल्कि छट पर्व का उपवास करने वाले वैज्ञानिक आधार पर शारीरिक और मानसिक दोनों रूप में इसके लिए तैयार होते हैं।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी सूर्य मानव जीवन चक्र का कारक एवं ऊर्जा का सबसे बड़ा स्रोत माना जाता है।

प्रतिदिन भगवान सूर्य को जल देने की बात करें तो इसके पीछे रंगों का विज्ञान छुपा है। मनुष्य के शरीर में रंगों का संतुलन बिगड़ने से मनुष्य को कई तरह की बीमारियां होने का खतरा रहता है। विज्ञान में प्रिज्म का सिद्धांत कहता है,कि सुबह सूर्यदेव को जल चढ़ाते समय शरीर पर पड़ने वाले प्रकाश की संश्लेषण से रंग संतुलित हो जाते हैं। जिस कारण शरीर में रोग प्रतिरोधक शक्ति बढ़ जाती है। शरीर में त्वचा के रोग कम होने लगते हैं। प्रकाश संश्लेषण की क्रिया में पेड़ पौधों से ऑक्सीजन का उत्सर्जन होता है। यह ऑक्सीजन मानव जीवन की प्राण वायु बनता हैं। बाह्य वातावरण में संतुलन बना रहता है। सूर्य की ऊर्जा से निकलने वाली किरणें मानव जीवन को आरोग्य प्रदान करने के साथ-साथ जीवन को चलायमान बनाने में भी अहम भूमिका निभाती है।

सूर्य की रोशनी से मिलने वाला विटामिन डी की कमी पूरी होती है। वैज्ञानिक दृष्टि से कार्तिक शुक्ल षष्ठी से सृष्टि में विशेष खगोलीय बदलाव आता है। तब सूर्य की परा बैगनी किरणें असामान्य रूप से एकत्र होती हैं और इनके दुष्प्रभावों से बचने के लिए सूर्य की ऊष्मा और प्रत्यूषा के रहते जल में खड़े रहकर छठ व्रत किया जाता है।

ऋतु चक्र में शरद ऋतु के अनुसार छट पर्व पर भोज्य पदार्थों का सेवन शरीर को उपवास के अनुकूल तैयार करने की प्रक्रिया का एक हिस्सा है। छठ पर्व में बनाए जाने वाले अधिकतर भोज्य पदार्थों में कैल्शियम की भारी मात्रा मौजूद रहती है। भूखे रहने के दौरान अथवा उपवास की स्थिति में मानव शरीर नैचुरल कैल्शियम का ज्यादा उपभोग करता है। प्रकृति में सबसे ज्यादा विटामिन-डी सूर्योदय और सूर्यास्त के समय मिलती है। सूर्य अर्घ्य का समय भी यही रहता है। विज्ञान के सिद्धांत के अनुसार किसी भी उपवास के बाद कोई भी भारी भोजन हानिकारक होता है।

ज्योतिष विज्ञान में ग्रहों के काल चक्र के अनुसार देखें तो देवगुरु बृहस्पति जब अपनी उच्च राशि में बैठकर सौभाग्य का सृजन करते हैं। तब सूर्य,पृथ्वी और चंद्रमा लगभग एक ही रेखा पर स्थित होते हैं, इस अवस्था में सूर्य की पराबैंगनी किरणें चंद्र की सतह से परावर्तित होकर और वायुमंडलीय परतों से अपवर्तित करती हुई पृथ्वी पर सामान्य से अधिक मात्रा में लौट आती हैं। विशेष रूप से सूर्योदय और सूर्यास्त के समय इन किरणों की सघनता बढ़ जाती है।सू सूर्य नारायण को अर्घ देने से मनुष्य को सूर्य के प्रकाश से विटामिन-डी की प्राप्ति,शरीर को शुद्ध करने तथा मानसिक शांति मिलती है।नित्य सूर्य नारायण की उपासना करने से व्यक्ति को दीर्घायु,तेजस्वी पुत्र की प्राप्ति,घर-परिवार में सुख-समृद्धि की वृद्धि होती है एवं असाध्य रोगों से भी मुक्ति मिलती है।
प्रस्तुति डॉ कमल किशोर डुकलान
