शंकराचार्यों और धर्माचार्यों ने एकमत होकर किया अभियान का समर्थन, विद्वत परिषद और संत-संन्यासी परिषद का गठन
स्वामी रामदेव बोले- मुझे श्रेय नहीं चाहिए, सनातन का गौरव लौटाना ही हमारा संकल्प

जनक्रांति ब्यूरों
हरिद्वार। सनातन धर्मग्रंथों की प्रामाणिकता और परंपराओं के संरक्षण के लिए देशभर के संतों और धर्माचार्यों ने पतंजलि में बड़ा कदम उठाया है। अखिल भारतीय प्राच्य विद्या सम्मेलन (एआईओसी) के दूसरे दिन शंकराचार्यों, अखाड़ों और विभिन्न गुरु परंपराओं के प्रतिनिधियों की मौजूदगी में ‘सनातन शास्त्र शुद्धि समिति’ के गठन पर सर्वसम्मति बनी। समिति के माध्यम से धर्मग्रंथों में कथित प्रक्षेपण, मिलावट और विकृतियों से जुड़े विषयों का अध्ययन किया जाएगा।

समिति के अंतर्गत विद्वत परिषद और संत-संन्यासी परिषद का गठन भी किया गया है। विद्वत परिषद में वेद, संस्कृत और शास्त्रों के जानकार विद्वान शामिल होंगे। परिषद धर्मग्रंथों से जुड़े विषयों का अध्ययन कर अपनी रिपोर्ट संत-संन्यासी परिषद को सौंपेगी। इसके बाद समिति का मार्गदर्शक मंडल रिपोर्ट का परीक्षण करेगा। विचार-विमर्श और आवश्यक संशोधनों के बाद ही अंतिम निर्णय की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी। समिति में सिख, जैन और बौद्ध परंपराओं का प्रतिनिधित्व भी सुनिश्चित करने की बात कही गई है।

स्वामी परमात्मानंद महाराज को संत-संन्यासी परिषद का संयोजक और केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के प्रोफेसर श्रीनिवास वरखेड़ी को विद्वत परिषद का संयोजक बनाया गया है।
श्रेय नहीं, सनातन का गौरव लौटाना उद्देश्य : रामदेव
समिति के गठन के दौरान योगगुरु स्वामी रामदेव भावुक हो गए। उन्होंने संतों से कहा कि उन्हें इस अभियान का कोई श्रेय नहीं चाहिए। उनका उद्देश्य सनातन का गौरव लौटाना है। उन्होंने कहा कि वेद, श्रुति और ऋषि परंपरा को प्रमाणिक स्वरूप में सामने लाने तथा सनातन धर्म की वैज्ञानिकता का दुनिया में प्रचार करने की जरूरत है।

स्वामी रामदेव ने आरोप लगाया कि कुछ लोग अपुष्ट संदर्भों और एआई टूल्स से प्राप्त जानकारियों के आधार पर देवी-देवताओं और अवतारी सत्ताओं के चरित्र पर सवाल उठाते हैं। ऐसे मामलों में प्रमाणिक शास्त्रीय संदर्भों के आधार पर तथ्यों को सामने लाना आवश्यक है।
शास्त्रों के अध्ययन के बाद ही होगा निर्णय
आचार्य बालकृष्ण ने कहा कि संतों ने सनातन शास्त्र शुद्धि अभियान की जो जिम्मेदारी उठाई है, उसे पूरी प्रमाणिकता और योजनाबद्ध तरीके से पूरा किया जाएगा। उन्होंने बताया कि भारतीय इतिहास के कथित विकृत पक्षों का सनातन दृष्टिकोण से पुनर्लेखन करने का कार्य भी पतंजलि योगपीठ में चल रहा है।

कार्ष्णि पीठाधीश्वर स्वामी गुरुशरणानंद ने समिति में शुद्ध आचरण वाले और शास्त्रों के गहन जानकार विद्वानों को शामिल करने का सुझाव दिया। स्वामी राजेंद्र दास महाराज ने भी शास्त्रों के संबंध में उठाए जा रहे अनुचित सवालों का संतों और विद्वानों की ओर से जवाब देने पर जोर दिया।

जूनापीठाधीश्वर स्वामी अवधेशानंद गिरि, स्वामी गोविंददेव गिरि, ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य स्वामी वासुदेवानंद सरस्वती, स्वामी चिदानंद सरस्वती, स्वामी ज्ञानानंद और स्वामी जितेंद्रानंद सरस्वती सहित अनेक संतों ने अभियान का समर्थन किया। आरएसएस के अखिल भारतीय संपर्क प्रमुख रामलाल और विश्व हिंदू परिषद के अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष आलोक कुमार ने भी अपने विचार रखे।

इस अवसर पर स्वामी रामदेव और आचार्य बालकृष्ण द्वारा लिखित पुस्तक ‘वैदिक आख्यान विज्ञान’ का विमोचन किया गया। सम्मेलन में देशभर के मठों, पीठों, अखाड़ों और धार्मिक संस्थाओं के प्रतिनिधियों के साथ 23 विश्वविद्यालयों के कुलपति तथा करीब 40 विद्वानों ने शास्त्र विमर्श में भाग लिया।
