स्वामी रामदेव बोले—हम वेदों को जीने वाले हैं, हमारे भीतर रामत्व, कृष्णत्व और शिवत्व
52वें अखिल भारतीय प्राच्य विद्या सम्मेलन का शुभारंभ, राज्यपाल ने किया भारतीय ज्ञान परंपरा के संरक्षण का आह्वान

जनक्रांति ब्यूरों
हरिद्वार। पतंजलि विश्वविद्यालय में गुरुवार को 52वें अखिल भारतीय प्राच्य विद्या सम्मेलन का शुभारंभ उत्तराखंड के राज्यपाल डॉ. ढाल सिंह बिसेन ने दीप प्रज्ज्वलित कर किया। तीन दिवसीय सम्मेलन में भारतीय ज्ञान परंपरा, वेद, दर्शन, संस्कृत साहित्य और प्राचीन ग्रंथों के प्रामाणिक अध्ययन पर मंथन किया जा रहा है। इस दौरान स्वामी रामदेव ने सनातन धर्म के ग्रंथों की कथित गलत व्याख्याओं पर सवाल उठाते हुए शास्त्र शुद्धि अभियान शुरू करने की घोषणा की।

गलत व्याख्याओं को दूर करने पर जोर
स्वामी रामदेव ने कहा कि कुछ लोग अज्ञान और अविवेक के कारण सनातन धर्म, देवी-देवताओं और ऋषि परंपरा को खंडित रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं। उन्होंने रामायण, महाभारत और पुराणों की कुछ व्याख्याओं पर आपत्ति जताते हुए कहा कि प्राचीन ग्रंथों में कथित मिलावट और गलत व्याख्याओं की समीक्षा की जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि पतंजलि के माध्यम से इस दिशा में प्रयास किया जाएगा।

स्वामी रामदेव ने कहा कि शास्त्रों की व्याख्या करते समय उनके मूल संदर्भ और ऋषियों के विचारों को समझना जरूरी है। उन्होंने कहा कि वेद, रामायण, महाभारत और भारतीय दर्शन केवल अध्ययन की विषयवस्तु नहीं, बल्कि जीवन में उतारने वाली ज्ञान परंपरा हैं। उनके अनुसार, भारतीय शिक्षा बोर्ड के माध्यम से देश की शिक्षा व्यवस्था को भारतीय ज्ञान परंपरा से जोड़ना भी जरूरी है।

स्वामी रामदेव ने जातिगत भेदभाव से ऊपर उठकर समानता और सेवा का संदेश देते हुए कहा कि अन्याय का विरोध, अभाव दूर करना और सेवा करना भारतीय जीवन मूल्यों का हिस्सा है। उन्होंने कहा कि सनातन धर्म और संस्कृति पर सवाल उठाने वालों के मामलों में कानूनी रास्ता भी अपनाया जाएगा।

सनातन के गौरव को पुनः स्थापित करने का संकल्प
पतंजलि विश्वविद्यालय के कुलपति आचार्य बालकृष्ण ने कहा कि अखिल भारतीय प्राच्य विद्या सम्मेलन केवल अकादमिक आयोजन नहीं, बल्कि सनातन की गौरवशाली परंपरा को पुनः प्रतिष्ठित करने के संकल्प का मंच है। उन्होंने कहा कि प्राचीन ग्रंथों में कथित रूप से जोड़ी गई भ्रामक बातों और मूल ऋषि चिंतन के बीच अंतर समझना जरूरी है।

आचार्य बालकृष्ण ने बताया कि पतंजलि में आयुर्वेद, योग और वनस्पति सहित विभिन्न क्षेत्रों में शास्त्रीय ज्ञान को आगे बढ़ाने के लिए कार्य किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि प्राचीन ज्ञान और आधुनिक विज्ञान के बीच समन्वय स्थापित कर राष्ट्र निर्माण में योगदान देना सम्मेलन का महत्वपूर्ण उद्देश्य है।
भारतीय ज्ञान परंपरा के संरक्षण पर जोर
राज्यपाल डॉ. ढाल सिंह बिसेन ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा का उद्देश्य व्यक्ति में विवेक, समाज में सद्भाव और समस्त सृष्टि के प्रति कल्याणकारी दृष्टिकोण विकसित करना है। सम्मेलन प्राचीन ज्ञान संपदा के संरक्षण, संवर्धन और वर्तमान जीवन में उसकी प्रासंगिकता समझने का महत्वपूर्ण अवसर है। उन्होंने व्याकरण, तर्कशास्त्र, गणित, खगोल विज्ञान, आयुर्वेद, योग और दर्शन के क्षेत्र में भारतीय विद्वानों के योगदान का उल्लेख करते हुए धर्म, संस्कृति और प्राचीन विद्याओं के संरक्षण का आह्वान किया।

सम्मेलन के अध्यक्ष एवं केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. श्रीनिवास वरखेड़ी ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा को भारतीय दृष्टिकोण से समझने की आवश्यकता है। उन्होंने ऑल इंडिया ओरिएंटल कॉन्फ्रेंस के संदर्भ में ‘ओरिएंटल’ के स्थान पर ‘प्राच्य विद्या’ शब्द के प्रयोग और आगे ‘भारत विद्या’ की दिशा में बढ़ने का सुझाव दिया।
पुस्तकों का विमोचन, शोध-पत्रों पर चर्चाकार्यक्रम में राज्यपाल ने ‘भारतीय दर्शनों का इतिहास एवं मीमांसा’, ‘वेदामृत’ और ‘भारतीय दर्शन बोध’ पुस्तकों का विमोचन किया। उन्होंने पुस्तक मेले का उद्घाटन भी किया, जहां भारतीय दर्शन, संस्कृत साहित्य, वेद, आयुर्वेद और प्राचीन ज्ञान परंपरा से संबंधित पुस्तकों का प्रदर्शन किया गया।

अखिल भारतीय प्राच्य विद्या परिषद की महासचिव प्रो. कविता होले ने परिषद की परंपरा और प्राचीन भारतीय ज्ञान, संस्कृत साहित्य, दर्शन, इतिहास, अभिलेखों तथा पांडुलिपियों के अध्ययन को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य की जानकारी दी।

29 से 31 अक्टूबर तक आयोजित सम्मेलन में पूर्ण सत्रों, विशेष पैनल चर्चाओं, शोध-पत्रों और पोस्टर प्रस्तुतियों के साथ महर्षि पतंजलि सभा तथा ब्रह्मवादिनी सभा के समानांतर सत्र आयोजित किए जा रहे हैं। कार्यक्रम में 23 विश्वविद्यालयों के कुलपति, विद्वान, संत, शोधार्थी और पतंजलि विश्वविद्यालय के विद्यार्थी शामिल हुए।
