29 अक्टूबर से पतंजलि विश्वविद्यालय में शुरू होगा 52वां अखिल भारतीय प्राच्य विद्या सम्मेलन, सनातन शास्त्र शुद्धिकरण अभियान का होगा शुभारंभ

जनक्रांति ब्यूरों
हरिद्वार। सनातन धर्म के ग्रंथों में मिलावट और देवी-देवताओं के चरित्र को लेकर की गई कथित गलत व्याख्याओं के मुद्दे पर स्वामी रामदेव ने शास्त्रों के शुद्धिकरण का अभियान शुरू करने की घोषणा की है। उन्होंने आरोप लगाया कि सनातन धर्म को बदनाम करने के लिए ऐतिहासिक रूप से शास्त्रों में प्रक्षेप किए गए और उनकी गलत व्याख्याएं प्रस्तुत की गईं। इस विषय को लेकर 29 से 31 अक्टूबर तक पतंजलि विश्वविद्यालय में 52वां अखिल भारतीय प्राच्य विद्या सम्मेलन आयोजित किया जाएगा।
बुधवार को कनखल स्थित दिव्य योग मंदिर, कृपालु बाग आश्रम में आयोजित प्रेसवार्ता में स्वामी रामदेव और आचार्य बालकृष्ण ने सम्मेलन की जानकारी दी। स्वामी रामदेव ने कहा कि सम्मेलन में सनातन धर्म के मूल स्वरूप, शास्त्रों की प्रामाणिकता और उनकी व्याख्याओं पर चर्चा की जाएगी। उन्होंने कहा कि शास्त्रों के नाम पर प्रचलित कथित मिलावटी प्रसंगों और गलत व्याख्याओं की पहचान कर उन्हें सामने लाने के लिए समिति गठित करने की योजना है।

कर्म आधारित वर्ण व्यवस्था पर दिया जोर
स्वामी रामदेव ने कहा कि सनातन धर्म में सभी जातियों को समान मानने और कर्म के आधार पर वर्ण व्यवस्था की व्याख्या करने की परंपरा है। उनके अनुसार, धर्म के नाम पर जातिगत भेदभाव और स्त्रियों के अपमान को सनातन के मूल सिद्धांतों से जोड़ना उचित नहीं है। उन्होंने कहा कि समाज में भेदभाव की दीवारें खत्म कर समानता, सत्य और न्याय को बढ़ावा दिया जाना चाहिए।
शास्त्रों के प्रामाणिक प्रकाशन की योजना
स्वामी रामदेव ने कहा कि वेद, उपनिषद, रामायण, महाभारत, पुराणों और विभिन्न दर्शन ग्रंथों के प्रामाणिक प्रकाशन की दिशा में काम किया जाएगा। उन्होंने संस्कृत ग्रंथों की व्याख्या में भाषा और मूल संदर्भों के ज्ञान को जरूरी बताते हुए कहा कि शास्त्रों के अध्ययन में प्रमाण और विद्वत्तापूर्ण विवेचना को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
उन्होंने विदेशी विद्वानों की कुछ व्याख्याओं पर भी सवाल उठाए और आरोप लगाया कि उनके माध्यम से भारतीय धार्मिक परंपराओं को गलत रूप में प्रस्तुत किया गया। उनके इन दावों पर सम्मेलन में विद्वानों के बीच चर्चा होने की बात कही गई।
देशभर के धर्माचार्य और विद्वान होंगे शामिल
स्वामी रामदेव के मुताबिक, सम्मेलन में विभिन्न परंपराओं के संत, शंकराचार्य या उनके प्रतिनिधि, संस्कृत के विद्वान और धर्माचार्य शामिल होंगे। आयोजन में करीब चार से पांच हजार संस्कृत विद्वानों और सैकड़ों आध्यात्मिक गुरुओं के भाग लेने की संभावना जताई गई है।
सम्मेलन का उद्घाटन राज्यपाल द्वारा किए जाने की जानकारी दी गई। आयोजन में केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. श्रीनिवास वरखेड़ी, पतंजलि विश्वविद्यालय की प्रति कुलपति साध्वी देवप्रिया, एआईओसी की महासचिव प्रो. कविता होले और संयुक्त सचिव प्रो. शिवानी वी. सहित अन्य विद्वानों के शामिल होने की बात कही गई है।
स्वामी रामदेव ने सम्मेलन को गैर-राजनीतिक आयोजन बताते हुए कहा कि इसका उद्देश्य सनातन धर्म के शास्त्रों के मूल स्वरूप पर विमर्श करना और भारतीय सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक विरासत को सामने रखना है।
