राष्ट्रीय संगोष्ठी में विशेषज्ञों ने साफ कहा—नाबालिगों की कानूनी सुरक्षा से नहीं हो सकता समझौता।
उम्र घटाने के बजाय परिवार, मूल्य-आधारित शिक्षा, परामर्श और कानूनों के प्रभावी क्रियान्वयन पर जोर।

जनक्रांति ब्यूरों
नई दिल्ली। किशोरों के सहमति-आधारित संबंधों को लेकर आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी में सहमति की कानूनी उम्र 18 वर्ष से कम न करने की जोरदार सिफारिश की गई। विशेषज्ञों ने स्पष्ट कहा कि उम्र सीमा में ढील नाबालिगों को मिलने वाले कानूनी संरक्षण को कमजोर कर सकती है। बच्चों की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता रहनी चाहिए।
सांस्कृतिक गौरव संस्थान की ओर से कॉन्स्टिट्यूशन क्लब ऑफ इंडिया में आयोजित संगोष्ठी में न्यायपालिका, चिकित्सा, मनोविज्ञान, शिक्षा और विधि क्षेत्र के विशेषज्ञों ने किशोर संबंधों से जुड़े सामाजिक, मानसिक और कानूनी पहलुओं पर मंथन किया।

सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति विनीत सरन सहित विशेषज्ञों ने कहा कि किशोरावस्था भावनात्मक और मनोवैज्ञानिक विकास का संवेदनशील दौर है। इसलिए समाधान सहमति की उम्र घटाने में नहीं, बल्कि मौजूदा कानूनों के निष्पक्ष और संवेदनशील क्रियान्वयन, मजबूत पारिवारिक व्यवस्था और प्रभावी परामर्श में है।
संगोष्ठी में मूल्य-आधारित शिक्षा, अभिभावकों और किशोरों के बीच खुले संवाद, मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं, डिजिटल साक्षरता और सोशल मीडिया के जिम्मेदार उपयोग को बढ़ावा देने पर भी जोर दिया गया।
