52वें अखिल भारतीय प्राच्य विद्या सम्मेलन में देश-विदेश के विद्वान जुटेंगे, अब तक करीब एक हजार विद्यार्थियों ने कराया पंजीकरण

जनक्रांति ब्यूरों
हरिद्वार। पतंजलि विश्वविद्यालय में संस्कृत, संस्कृति और भारतीय ज्ञान परंपरा का बड़ा संगम होने जा रहा है। 52वें अखिल भारतीय प्राच्य विद्या सम्मेलन को लेकर विद्यार्थियों, शोधार्थियों और देश-विदेश के विद्वानों में खासा उत्साह है। अब तक करीब एक हजार विद्यार्थी पंजीकरण करा चुके हैं। बढ़ती रुचि को देखते हुए सम्मेलन में भाग लेने के लिए पंजीकरण की अंतिम तिथि बढ़ाकर 10 अक्टूबर कर दी गई है।
पतंजलि विश्वविद्यालय के कुलाधिपति स्वामी रामदेव ने कहा कि भारत की सभ्यता, संस्कार, शास्त्र परंपरा और सनातन विरासत संस्कृत में सुरक्षित है। ऐसे में सम्मेलन केवल विद्वानों के विचार-विमर्श तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि भारतीय ज्ञान-संपदा के वैज्ञानिक और व्यावहारिक पक्षों को सामने लाने का मंच बनेगा।
उन्होंने कहा कि सम्मेलन में भारत के साथ विभिन्न देशों के प्राच्य विद्या विशेषज्ञ, शिक्षाविद्, शोधकर्ता और विद्वान हिस्सा लेंगे। योग, आयुर्वेद, वेद-वेदांत, दर्शन, साहित्य, भाषा, व्याकरण, इतिहास और पुरातत्त्व समेत भारतीय विद्याओं की विभिन्न धाराओं पर शोधपरक विमर्श होगा।
स्वामी रामदेव ने कहा कि “विरासत और विज्ञान, शोध और बोध, दृष्टि और दक्षता” का समन्वय पतंजलि का मूल संकल्प है। प्राचीन ज्ञान को केवल अतीत की धरोहर मानने के बजाय उसका गंभीर अध्ययन, शोध और आधुनिक संदर्भों में पुनर्पाठ जरूरी है।
उन्होंने विद्यार्थियों और शोधार्थियों से सम्मेलन में अधिक से अधिक संख्या में भाग लेने का आह्वान किया। कहा कि अपनी भाषा, संस्कृति और ज्ञान परंपरा को समझना भविष्य को मजबूत बनाने का आधार है।
